स्वामी विवेकानंद

आज के इस मानसिक तनावपूर्ण समय में एकाग्रता आत्मश्रद्धा और उत्तम विचारशक्ति से हम इस जगत के सामने खड़े होने की शक्ति प्रदान करती महान युवा स्वामी विवेकानद की जिंदगी के बारे में कुछ जानकारी लेते हे |
स्वामी विवेकानदं ने अपने भासणो लेखों के द्वारा हमारे भारतीय समाज को जोड़ा और पुरे विश्व में हिन्दू धर्म और हमारे प्राचीन धरोहर से अवगत कराया | Sisters and Brothers of America बस इन्ही शब्दों ने पार्टिलिअमेंट ऑफ़ अमेरिका के लिए आये लोगो को खड़े होकर ताली बजने पर मजबूर कर दिया ये वही स्वामी विवेकानंद हे जिन्होंने युवा पेढी को कहा था उठो जागो और तब तक न रुको जब तक अपना लक्ष्य न हासिल कर लो | इसी बातो ने कई लोगो को अपना सपना पूरा होने का हौसला और उम्मीद दी और आज भी उनके लेखो एवं भासणो द्वारा हम वही हौसला और उम्मीद आज भी दे रहा हे | स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में कैसे अपने मन और जीवन को काबू किया कैसे अपने आपको टूटकर हार मानने से रोका जानते हे उनके जीवन परिचय के द्वारा |
स्वामी विवेकानंद का जन्म : १२ जनवरी १८६३
स्वामी विवेकानंद का नाम : नरेंद्रनाथ दत्त
पिता का नाम : विश्वनाथ दत्त
माता का नाम : भुवनेश्वरी देवी
जन्म स्थान : कोलकाता
शिक्षा : प्रेसीडेन्सी कॉलेज से बी.ए उत्तीर्ण
मृत्यु : ४ जुलाई १९०२
Table of Contents
१.१ स्वामी विवेकानंद का बचपन
१.२ स्वामी विवेकानंद के गुरु
१.३ स्वामी विवेकानंद की स्पीच
१.४ स्वामी विवेकानंद का योगदान
१.५ स्वामी विवेकानंद के विचार
१.६ स्वामी विवेकानंद की मृत्यु
१.१ स्वामी विवेकानंद का बचपन
स्वामी विवेकानंद का जन्म १२ जनवरी १८६३ कोलकाता में मकरसंक्रांति के दिन सुबह हुआ था | स्वामी विवेकानंद ९ भाई बेहेन थे | स्वामी विवेकानंद के पिता कोलकाता के हाई कोर्ट में अटॉर्नी-एट-लॉ थे | स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र था जो की उनके पिता विश्वनाथ दत्त ने रखा था | लेकिन उनकी माता भुवनेश्वरी देवी शिव भक्त थी उन्होंने स्वामी विवेकानंद का नाम वीरेश्वर रखा था | वीरेश्वर भगवान शिव का ही एक नाम हे इसी लिए माता ने उनका नाम वीरेश्वर रखा | बचपन से ही नरेन्द्र अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के और नटखट थे। स्वामी विवेकानंद भी अपनी माता के देखा देखि में ध्यान करते थे उनके साथिओ को भी ध्यान सिखाया करते थे उनके साथ वह भी ध्यान लगाते थे | स्वामी विवेकानंद ध्यान में उतना डूब जाते की उन्हें आस पास की कोई खबर नहीं रहती थी | वह बचपन में ही भगवान से जुड़ ने लगे थे वह रामायण महाभारत की कथाये कहानिया से बहुत प्रभावित थे |
१.२ स्वामी विवेकानंद के गुरु
स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम रामकृष्ण परमहंश था | स्वामी विवेकानंद के जीवन में उनके गुरु का बहुत ही बड़ा योगदान रहा | स्वामी विवेकानंद की ईश्वर की खोज ने उन्हें रामकृष्ण परमहंश जी से मिलवाया, स्वामी विवेकानंद की अपने गुरु से पहली मुलाकात में रामकृष्ण परमहंश ने कुछ सुनाने को कहा तब स्वामी विवेकानंद की आवाज सुनकर बहुत प्रभावित हुए | रामकृष्ण परमहंश पहले व्यक्ति थे जिसने स्वामी विवेकानंद को कहा है मेने ईश्वर को देखा हे |
स्वामी विवेकानंद और उनके गुरु के बिच हुए संवाद होता हे तब स्वामी विवेकानंद पूछते हे आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया हे तब रामकृष्ण परमहंस जी कहते जीवन का विश्लेषण करना बंद करदो जीवन को बस जियो | दूसरा सवाल पूछते हुए स्वामी विवेकानंद कहते हे फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हे तब रामकृष्ण परमहंस जी कहते हे परेशान होना तुम्हारी आदत बन गई हे इसलिए तुम खुस नहीं रह पाते , तब स्वामी विवेकानंद पूछते हे अच्छे लोग लोग हेमशा दुःख क्यों पाते हे तब रामकृष्ण जी कहते हे हिरा रगड़े जाने पर चमकता हे सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता हे अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओ से गुजरते हे इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता हे | स्वामी विवेकानंद अगला प्रश्न पूछते हुए कहते हे ऐसा अनुभव उपयोगी होता हे ? रामकृष्ण परमहंश जी कहते हां अनुभव एक शिक्षक की तरह हे पहले वह परीक्षा लता हे फिर सिख देता हे | स्वामी विवेकानंद लोगो की कोनसी बाटे आपको हैरान करती हे तब रामकृष्ण परमहंश जी कहते हे जब भी वह मुशीबत में होते हे तब ईश्वर से पूछते हे में ही क्यों ? लेकिन जब खुशियों में डूबे होते हे तब ईश्वर से कभी नहीं पूछते में ही क्यों ? | स्वामी विवेकानंद सवाल करते हुए कहते हे कभी लगता मेरी प्राथना बेकार जा रही हे इसके जवाब में रामकृष्ण परमहंश उत्तर देते हे प्राथना कभी बेकार नहीं जाती अपनी आस्था और विश्वास बनाये रखो अपने डर को परे रखो जीवन एक रहस्य हे जिसे तुम्हे खोजना हे | गुरु के मृत्यु के बाद भारत भ्रमण पर निकल पड़े |
१.३ स्वामी विवेकानंद की स्पीच
११ सितम्बर १८९३ आयोजित विश्व धर्म संसद में भाषण दिया था वह इतिहास का सबसे चर्चित भाषण हे | भाषण देते हुए वह बोले भाइयो और बहेनो आपके इस स्नेहपूर्ण स्वागत से मेरा ह्रदय अपार हर्ष से भर गया हे | में आपको सबसे प्राचीन धर्म परंपरा की तरफ से धन्यवाद देते हुए बोले में धर्मो की जननी की तरफ से धन्यवाद् देता हु और सभी जाती संप्रदाय के लाखों , करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हु | मुझे गर्व हे की में एक ऐसे देश से हूँ , जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मो के परेशान और सताए गए लोगो को शरण दी हे | हमने अपने ह्रदय में उन् इज़्रायलियो की पवित्र स्मृतियां संजोकर राखी हे जिनके धर्म स्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़कर खंडर बना दिया तब उन्होंने भारत में शरण ली थी | इसके बाद विवेकानंद ने कुछ श्लोक की पंक्तियां भी सुनाई थीं | स्वामी जी जब अमरीका में थे तब एक महिला उनसे इतनी प्रभावित हुई की स्वामी जी से शादी करने इच्छा उनके सामने जाहिर करदी , तब स्वामी जी ने उनसे पूछा की आ|प मुझसे शादी क्यों करना चाहती हे तब महिला ने कहा में आपकी बुद्धि से बहुत प्रभावित हु इसीलिए में आपसे शादी करके बुद्धिमान बच्चे की माँ बनना चाहती हु | स्वामी जी ने कहा आप अपने मुझे अपने बच्चे के रूप में स्वीकार कर ले इस प्रकार आपको मेरे जैसा बुद्धिमान बच्चा पाने की इच्छा भी पूरी हो जाएगी |
१.४ स्वामी विवेकानंद का योगदान
स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण की मृत्यु के बाद देश के पुननिर्माण के लिए समूचे भारत में भर्मण पर निकल पड़े | भारत ले अध्यात्मवाद लो पूरी दुनिया में फैलाने के लिए स्वामी विवेकानंद ने यूरोप की भी यात्रा की |
१८९४ में स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में वेदांत सोसायटी की स्थापना की |
१८९५-९६ke मध्य स्वामी जी ने इंग्लैंड की यात्रा की |
१८९६-९७ में कोलकाता में रामकृष्ण मिसन की स्थापना की |
स्वामी विवेकानंद ने हिन्दू धर्म में व्याप्त कुरीतियों तथा रूढिवादिताओ का विरोध किया |
इन्होने छुआ-छूत की आलोचना करते हुए कहा की हमारे धर्म हमारे रसोईघरों में बसते हैं |
१८९९ में अल्मोड़ा के निकट इन्होनें एक और मठ की स्थापना की |
१.५ स्वामी विवेकानंद के विचार
उठो जागो और तबतक मत रुको जबतक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाये |
स्त्रियों की स्थिति में सुधार न होने तक विश्व के कल्याण का कोई भी मार्ग नहीं हैं |
भला हम भगवान को खोजने कहाँ जा सकते हैं अगर उसे अपने ह्रदय और हर एक जीवित प्राणी में नहीं देख सकते |
प्रसन्नता अनमोल खजाना हे छोटी बातों पर उसे लूटने न दें |
इंसान खुद की नजर में सही होना चाहिये, दुनिया तो भगवान से भी दुखी हैं |
उम्मीद को हमेशा बना के रखना चाहिए क्योंकि उम्मीद के भरोसे ही हम सब कुछ वापस ला सकते हैं |
जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पे विश्वास नहीं कर सकते |
जीवन में रिश्ते होना जरुरी नहीं हे लेकिन जो भी रिस्तें हैं, उनमे जीवन का होना जरुरी हैं |
ज्ञान का प्रकाश सभी अंधेरों को खत्म कर देता हैं |
जितना कठिन संघर्ष होगा जित उतनी ही शानदार होगी |
तुम्हे कोई पढ़ा नहीं सकता कोई सीखा नहीं सकता , कोई आध्यात्मिक बना नहीं सकता , तुम्हे सब कुछ अंदर से सीखना हैं | आत्मा से बड़ा कोई शिक्षक नहीं हैं |
जब आप व्यस्त होते हैं तो सब कुछ आसान होता हे लेकिन आलसी होने पर कुछ भी आसान नहीं होता हैं |
आज्ञा देने की क्षमता प्राप्त करने से पहले आज्ञा का पालन करना सीखना चाहिए |
जिंदगी का रास्ता बना बनाया नहीं मिलता , स्वयं को बनाना पड़ता हैं , जिसने जैसा मार्ग बनाया उसे वैसी ही मंजिल मिलती हैं |
सफलता प्राप्त करने के लिए अटल धैर्य और दृढ़ इछाशक्ति चाहिए |
स्वयं में बहुत सी कमियों के बावजूद अगर में स्वयं से प्रेम कर सकता हूँ तो दुसरो में थोड़ी बहुत कमियों की वजह से उनसे घृणा कैसे कर सकता हूँ |
धन्य हैं वह लोग जिनके शरीर दूसरों की सेवा में नष्ट हो जाते हैं |
खुद को कमजोर समजना सबसे बड़ा पाप हैं |
किसी दिन , जब आपके सामने कोई समस्या न आये, आप सुनिश्चित हो सकते हैं की आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं |
बस वही जीते हैं जो दुसरो के लिए जीते हे |
जो लोग दिल के अच्छे होते हैं दिमाग वाले उनकी जमकर मजे लेते हैं |
जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेठ शिक्षक हैं |
स्वामी विवेकानंद की मृत्यु
स्वामी विवेकानंद की मृत्यु ४ जुलाई १९०२ में हुई थी | स्वामी विवेकानंद ने अपना आखिरी समय ध्यान में बिताया | स्वामी विवेकानंद अपने बिस्तर पर लेट गए ध्यान में थे उनका हाथ थोड़ा सा काँपा उन्होंने गहरी सांस ली | स्वामी विवेकानंद जी के शिष्य ने बताया उनके मुँह में , आँख में से खून निकल रहा था | योग शास्त्र के अनुसार एक योगी का जीवन उसके सिर के शीर्ष से गुजरता हे इसीलिए मुँह और आँख से खून प्रवाहित होता हे | उनका अंतिम संस्कार बेलूर के गंगा घाट पर किया गया |
FAQ
1 स्वामी विवेकानंद के गुरु का नाम क्या था ?
ans रामकृष्ण परमहंश
2 स्वामी विकानंद ने विवाह किया था ?
ans नहीं
3 स्वामी विवेककानद की किस आयु में मृत्यु हुई ?
ans 39
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